नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण उत्तराखंड अपनी समृद्ध जैवविविधता के लिए भी मशहूर

नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण उत्तराखंड अपनी समृद्ध जैवविविधता के लिए भी मशहूर है। हिमालय पर्वत श्रृंखला के रूप में यहां मौजूद जलस्तंभ से देश के करोड़ों लोगों की आर्थिकी-आजीविका जुड़ी है। गंगा, यमुना, शारदा जैसी नदियों के उद्गम स्थल यहां के हिमखंडों और सघन वन क्षेत्रों में अवस्थित हैं। कुल भौगोलिक क्षेत्र का 71.05 फीसद क्षेत्र वनों के रूप में अधिसूचित है, जो बेशकीमती जड़ी-बूटियों का भंडार हैं। साथ ही यहां बाघ, हाथी समेत दूसरे वन्यजीवों का सुरक्षित बसेरा। साफ है कि इस छोटे से राज्य की देश के बड़े भू-भाग के पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भागीदारी है। 

यहां से मिल रही तीन लाख करोड़ की सालाना पर्यावरणीय सेवाएं इसकी तस्दीक करती है। तमाम दिक्कतों के बावजूद उत्तराखंड में जैवविविधता को संरक्षित रखने की दिशा में पूरी मुस्तैदी से कदम उठाए जा रहे हैं। न सिर्फ सरकार बल्कि, जनसामान्य को भी इसे लेकर अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभानी आवश्यक है।कुदरत ने उत्तराखंड को मुक्त हाथों से नेमतें बख्शी हैं। जंगल, नदी, झरने, पहाड़, सभी कुछ तो है यहां। दो टाइगर रिजर्व को सम्मिलित करते हुए छह राष्ट्रीय उद्यान, सात वन्यजीव विहार, चार कंजर्वेशन रिजर्व के साथ ही यहां के दूसरे संरक्षित-आरक्षित वन क्षेत्रों का प्राकृतिक सौंदर्य हर किसी को आकर्षित करता है। 

सूरतेहाल, जब हम पारिस्थितिकी को सहेज रहे तो पारिस्थितिकीय पर्यटन का उपयोग राजस्व अर्जन के साथ ही स्थानीय निवासियों की आय में वृद्धि के स्रोत के रूप में करना चाहिए। वजह यह कि पारिस्थितिकीय पर्यटन में प्रकृति से छेड़-छाड़ किए बगैर पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है।इससे पर्यटक जहां संरक्षण के भाव से ओत-प्रोत होते हैं, वहीं स्थानीय समुदाय की आर्थिकी संवरने के दरवाजे खुलते हैं। हालांकि, सरकार ने इस दिशा में पहल कर रही, मगर इन प्रयासों को अधिक तेजी देनी होगी। इससे गांवों से हो रहे पलायन को थामने में भी मदद मिलेगी।

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