उत्तराखंड के जंगल हुए वीरान; पौधरोपण से सिर्फ भरे कागज

जंगल में मोर नाचा किसने देखा। 71.05 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड के जंगलों में पौधरोपण के मामले में यह कहावत सटीक बैठती है। कागजों में हर साल बड़े पैमाने पर जंगलों में पौधे लग रहे, मगर जंगल वीरान से दिखते हैं। 

अब जरा वन महकमे के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो राज्य गठन के बाद से यहां के जंगलों में प्रतिवर्ष डेढ़ से दो करोड़ पौधे रोपे जा रहे हैं। इस लिहाज से प्रदेश में वनावरण कहीं आगे निकल चुका होता। चौतरफा हरे-भरे जंगल नजर आते। मगर दो दशक बाद भी वनावरण करीब 46 फीसद से आगे नहीं बढ़ पाया है। 

साफ है कि सिस्टम की नीयत में कहीं न कहीं खोट है। पौधे रोपकर इनकी तरफ नजरें फेर ली जा रही है। इसल सरकारी रवायत का ही परिणाम है कि जंगलों में 50 फीसद पौधे भी जिंदा नहीं रह पा रहे। सूरतेहाल, जंगल कैसे हरे-भरे होंगे, यह सबसे बड़ा सवाल है।

जंगल में कहां व कितने क्षेत्र में कितने पौधे लगे, रोपण के बाद इन्हें सुरक्षित रखने को क्या-क्या कदम उठाए गए हैं, रोपित पौधे जीवित हैं अथवा नहीं। ऐसे तमाम बिंदुओं की जांच पड़ताल को वन महकमे में बाकायदा मॉनीटरिंग सेल अस्तित्व में है। 

पौधरोपण की तस्वीर जांचना उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा होने के बावजूद वह ठीक से इसका निर्वह्न नहीं कर पा रहा। कभी-कभार इक्का-दुक्का क्षेत्रों का निरीक्षण कर यह सेल अपने दायित्व की इतिश्री कर देता है। यही कारण भी है कि मॉनीटरिंग सेल की ओर से पौधरोपण को लेकर उठाए गए सवालों पर शायद ही कभी कोई कार्रवाई हुई हो। 

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