त्रिवेंद्र रावत का राजनीती में बढ़ता कद,विरोधी हुए ध्वस्त

2017 उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला।,सत्तर सदस्यीय विधानसभा में 57 सीट प्राप्त हुई,लेकिन मुख्यमंत्री के लिए किसी चेहरे पर चुनाव नही लड़ा गया इसलिये “कौन बनेगा मुख्यमंत्री”पर बहस टी. वी. चेनलो से लेकर गली मोहल्लों तक चलती रही।
प्रचंड बहुमत उत्तराखंड में था साथ ही उत्तर प्रदेश में भी ।पूरे देश की नजरें ऊत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पर थी की किसे मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलेगी . । उत्तराखंड में भाजपा के प्रदेश अध्य्क्ष अजय भट्ट प्रचंड बहुमत के बावजूद भी रानीखेत से अपनी सीट नही बचा पाये,इससे बहसों में एक बड़ा नाम स्वतः ही अलग हो गया।चर्चाओं में कई नाम उभर रहे थे,कुछ पुराने ,कुछ नये।कथित दिल्ली दौड़ भी जारी थी।आखिर डोईवाला विधायक और पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र रावत की नाम की घोषणा आलाकमान ने की।लेकिन त्रिवेंद्र ने ना तो दिल्ली की दौड लगाई और ना इस बारे में किसी से कोई जिक्र किया . पर जिस तरिके से उनकी ताजपोशी हुई उसे देखते हुये तो यही कहा जा सकता है की वो हाईकमान की नजर में थे

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक के रूप में एक लंबे समय तक कार्य करने वाले त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ एक “लॉबी”मुख्यमंत्री बनने के बाद खूब सक्रिय हो गयी।जो हर कुछ महीनों के बाद उनके हटाये जाने की चर्चाये शुरू कर देती है .लेकिन यूं ही कोई तरक्की की मंजिलें नहीं चढता ये बात शायद विरोधियों को भी समझने की जरुरत है .

राजनितिक गलियारों में यह भी सुनने को मिलता है कि त्रिवेंद्र के बढ़ते कदमो की आहट उनके विरोधियों को पिछले कुछेक सालों में ही लगने लग गयी थी,जब उन्हें राष्ट्रीय सचिव का दायित्व दिया गया था।इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व उत्तर प्रदेश के प्रभारी अमित शाह के साथ सह प्रभारी बनाया गया।इस जोड़ी ने भाजपा को ऊत्तर प्रदेश में ऐतहासिक जीत में अपना योगदान दिया।2014 लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश की 70 सीटो की जीत ने भाजपा को अपने आप ही बहुमत पाने में बड़ी भूमिका निभाई लेकिन त्रिवेंद्र कुछ महीने बाद हुये डोईवाला उपचुनाव में हार गये, ये सीट पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल “निशंक”के हरिद्वार सांसद चुने जाने के बाद खाली हुयी थी।वैसे कोश्यारी और टम्टा के सांसद चुने जाने पर खाली हुयी विधानसभा सीटों पर भी भाजपा चुनाव हार गई थी .ये बात इसलिये भी चकित करने वाली थी कुछ महीने पहले पांचों संसदीय सीटें भाजपा ने भारी बहुमत से जीती थी।डोईवाला सीट पर हार के बारे में बहुत कुछ कहा गया।भीतर घात के भी आरोप लगे,कहा तो यह भी जाता है कि आलाकमान तक भी यह बात पहुंची।बहरहाल इस हार के बाद भी त्रिवेंद्र पार्टी के लिये ईमानदारी से कार्य करते रहे .

त्रिवेंद्र पार्टी केंद्रीय संघटन की “गुड लिस्ट”में थे और उनको झारखण्ड का प्रभारी बनाया गया जहां भाजपा ने बहुमत हासिल कर किया । इस बड़ी जिम्मेदारी का भी कुशलता से निर्वहन करने से त्रिवेंद्र का कद आलाकमान के सामने और बढ गया ।

इन सब चीजों को समझने वाले त्रिवेंद्र के विरोधी ये जानते है कि प्रचंड बहुमत में उनके खिलाफ कोई और कारगर कदम तो नही हो सकता इसलिये कुछ समयांतराल में यह चर्चाये शुरू करवा दी जाती है कि त्रिवेंद्र की कुर्सी खतरे में है,,,,

देवेंद्र बिष्ट वरिष्ठ पत्रकार

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