बंशीधर भगत अपनी अनूठी कार्यकुशलता से बने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष

उतार-चढ़ाव जिंदगी का मुख्य हिस्सा है, लेकिन बंशीधर भगत अपनी अनूठी कार्यकुशलता से जिंदगी के हर उतार-चढ़ाव को सहजता से पार कर जाते हैं। ऐसा नहीं कि उनके जीवन में राजनीतिक संकट न आया हो। कई बार विधायक बनने के बावजूद उन्हें छह महीने तक मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया। ऐसे कठिन दौर में भी भगत ने धैर्य नहीं खोया। बगावत नहीं की। अतत: इस धैर्य का उन्हें फल मिल ही गया।

बात वर्ष 2000 की है। उत्तराखंड अलग राज्य बना था। दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में भगत सिंह कोश्यारी ने जिम्मेदारी संभाल ली थी। तब भी बंशीधर को छह महीने तक मंत्री नहीं बनाया। वह चुपचाप अपने राजनीतिक मिशन में जुटे रहे। उन्होंने इस नाराजगी को न अपने चेहरे पर आने दिया और न ही मीडिया की सुर्खियां ही बनने दी। बाद में मंत्री बने। यही स्थिति एक बार फिर उत्पन्न हुई। 2017 में भी भाजपा प्रचंड बहुमत से जीती।

माना जा रहा था कि छठी बार विधायक बनने वाले राजनीति के बड़े चेहरे बंशीधर का नाम मंत्रिमंडल में होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ढाई साल सरकार बने हो गए हैं। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। विधानसभा क्षेत्र और उससे बाहर भी दौरा करते रहे। लोगों से लेकर कार्यकर्ताओं से संवाद जारी रखा। राजनीतिक रैलियां हों या बैठकें, हर जगह पूरी जिम्मेदारी से पार्टी की गतिविधियों में शामिल रहे। बड़ी रैलियां आयोजित कीं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को आमंत्रित करते रहे। यही उनका राजनीतिक कौशल और नीति थी कि वह मुकाम हासिल हो गया, जिसे पाने के लिए एक नेता अपनी पूरी जिंदगी राजनीति को समर्पित कर देता है।

About Surkanda Samachar

View all posts by Surkanda Samachar →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *