
भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों को अमेरिकी प्रशासन द्वारा लागू किए गए 50% उच्च टैरिफ से भारी नुकसान हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस कदम से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएंगे, जिससे भारत के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाएगा। इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था और रोजगार पर भी पडे़गा। वोंटोबेल में ईएम इक्विटीज के सह-प्रमुख राफेल लुएशर ने चेतावनी दी है कि यदि भारतीय कंपनियां निवेश में देरी करती हैं, तो इसका नकारात्मक असर नौकरियों पर पड़ सकता है।
नौकरियों पर खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च टैरिफ के कारण भारत के कपड़ा, जूते, आभूषण और ऑटो पार्ट्स उद्योगों में अगले 12 महीनों में 10 से 15 लाख नौकरियों का संकट उत्पन्न हो सकता है। अकेले कपड़ा उद्योग में एक लाख से अधिक नौकरियों के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा, सूरत और मुंबई के रत्न-आभूषण उद्योग में भी लाखों लोग रोजगार से वंचित हो सकते हैं।
कपड़ा और रत्न-आभूषण उद्योग पर सबसे अधिक असर
भारत अमेरिका को हर साल 10.3 अरब डॉलर का कपड़ा निर्यात करता है। उच्च टैरिफ के चलते भारतीय कपड़े अमेरिकी बाजार में बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले महंगे हो जाएंगे, जो भारतीय निर्यातकों के लिए भारी झटका साबित हो सकता है। भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ (FIEO) ने बताया कि तिरुपुर, नोएडा और सूरत जैसे प्रमुख केंद्रों के कपड़ा निर्माताओं ने उत्पादन रोक दिया है, जिससे इन क्षेत्रों में कामकाजी हालत बिगड़ सकती है।
वहीं, रत्न-आभूषण उद्योग में अमेरिका को निर्यात किए गए हीरे और सोने पर अतिरिक्त टैरिफ की मार पड़ेगी। उद्योग के प्रमुख, राजेश रोकड़े का कहना है कि यह स्थिति देश के निर्यात अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है, क्योंकि ऐसे उत्पादों की मांग अमेरिकी बाजार में घट सकती है।
बासमती चावल पर कम असर
भारत हर साल अमेरिका को 2.70 लाख टन बासमती चावल निर्यात करता है। हालांकि, इस पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाने के बावजूद, निर्यातकों का मानना है कि इसे अन्य देशों में आसानी से खपाया जा सकता है। भारत और पाकिस्तान के अलावा, बासमती चावल की अमेरिकी आपूर्ति में अन्य देशों की भूमिका कम है, जिससे भारत के लिए इस संकट को संभालना आसान हो सकता है।
सरकार की प्रतिक्रिया: राहत पैकेज और नए बाजारों की तलाश
भारतीय सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए रणनीति तैयार की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हाल ही में हुई बैठक में निर्यातकों और कामकाजी वर्ग के लिए राहत पैकेज की घोषणा की गई। इस पैकेज में आपातकालीन ऋण, निर्यातकों को एकमुश्त राहत, और कामकाजी लोगों की सुरक्षा पर जोर दिया गया है। सरकार का लक्ष्य प्रभावित क्षेत्रों के लिए नए बाजार तलाशने तक कम से कम छह महीने तक राहत देने का है।
विकल्प और जवाबी कार्रवाई
सरकार ने अमेरिका से आयातित ऊर्जा, रक्षा, और कृषि सामान पर जवाबी टैरिफ लगाने का विचार किया है, लेकिन चूंकि अमेरिका से भारत का कुल आयात केवल 45 अरब डॉलर का है, इससे खास असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। इसके अलावा, भारत इस मुद्दे को विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भी चुनौती दे सकता है, हालांकि वहां परिणाम जल्दी सामने आना मुश्किल है।
आर्थिक मंदी की संभावना
विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस टैरिफ नीति के असर से भारत की जीडीपी में अगले 12-18 महीनों में 0.2% से 1.1% तक गिरावट हो सकती है। मूडीज, नोमुरा और सिटीग्रुप जैसे आर्थिक संस्थानों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर का अनुमान 6.5% से घटाकर 6.3% कर दिया है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति पर और दबाव आ सकता है।
शेयर बाजार में गिरावट
उच्च टैरिफ की घोषणा और व्यापार वार्ता रद्द होने से भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली का दौर शुरू हो गया है। विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में भारी बिकवाली की, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी में 1-2% की गिरावट आई है। इस संकट का असर बैंकिंग, ऑटो, और रियल्टी शेयरों पर भी पड़ सकता है।
इस संकट का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार के पास अब वक्त कम है और उसे जल्दी ही ठोस कदम उठाने होंगे। क्या सरकार के प्रयास इस आर्थिक संकट से उबारने में सफल होंगे? यह सवाल आने वाले समय में स्पष्ट होगा।