
क्या आपका बच्चा दिनभर मोबाइल या टैब पर कार्टून देखता है? क्या वो आसपास के लोगों से कम बात करता है। अपनी ही दुनिया में खोया रहता है? मोबाइल लेने पर रोने लगता है और एग्रेसिव हो जाता है? अगर हां, तो सावधान हो जाइए!क्योंकि ये लक्षण ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ के हो सकते हैं। एक ऐसी नई और तेजी से बढ़ती मानसिक परेशानी, जो मोबाइल की आदत, स्क्रीन टाइम ज्यादा होने की वजह से कॉमन होती जा रही है। ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ कोई जन्म से होने वाली बीमारी नहीं है। ये एक नकली या टेम्परेरी ‘ऑटिज्म’ जैसा व्यवहार है। जो घंटों स्क्रीन के सामने रहने से आता है। जब बच्चे रील्स, गेम्स, शॉट्स की दुनिया में उलझे रहते हैं। खामियाजा ये कि बच्चे देर से बोलना शुरू करते हैं। आंखों में आंख डालकर बात नहीं करते। अपना नाम पुकारे जाने पर भी ध्यान नहीं देते। दूसरों से दूरी बना लेते हैं।
जो लोग लंबे समय तक फोन या टीवी से चिपके रहते हैं उन्हें घबराहट, अकेलापन, अनिद्रा, डिप्रेशन, हकीकत से दूरी, डिजिटल एडिक्शन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ज्यादा फोन के इस्तेमाल से नींद की समस्या भी बढ़ जाती है। फोन का इस्तेमाल करने वाले 60% लोगों में नींद की बीमारी पाई जाती है। इससे आंखों को भी नुकसान हो रहा है। स्मार्टफोन से निकलने वाली ब्लू लाइट रेटिना डैमेज कर नज़र कमज़ोर बनाती है। इससे विजन सिंड्रोम जैसे नजर कमजोर, ड्राईनेस, पलकों में सूजन, रेडनेस, तेज रोशनी से दिक्कत, एकटक देखने की आदत जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक स्क्रीन के ब्राइट कलर्स,आवाज और तेजी से लगातार बदलते सीन दिमाग पर असर डालते हैं। ऐसे में आपको ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का संकल्प लेना चाहिए। रोजाना योग से शरीर और दिमाग को डिटॉक्स करना चाहिए। इन सब के लिए बच्चो को फैमिली के साथ योग करने की सलाह दी जाती हैं। माता-पिता और घर के दूसरे सदस्यों को बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहिए। बच्चों को खेल कूद में व्यस्त रखें, सुबह शाम पार्क लेकर जाएं। बच्चों से बातें करें और खेल में उनके साथ समय व्यतीत करें। सोते वक्त और उठते ही स्कीन से दूर रहें। सोशल मीडिया पर ज्यादा समय न बिताएं। अपना डेली का स्क्रीन टाइम चेक करें। रोजाना योग और एक्सरसाइज करें।