नई दिल्ली, 28 जनवरी 2026:
हाल ही में ग्लोबल फायरपावर (Global Firepower) इंडेक्स 2026 ने 145 देशों की सैन्य ताकत की वार्षिक रैंकिंग जारी की है, जिसमें भारत ने दुनिया की चौथी सबसे मजबूत सैन्य शक्ति के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखी है, जबकि पाकिस्तान शीर्ष 10 से बाहर उतर गया है। यह रैंकिंग 60 से अधिक संकेतकों जैसे मानव संसाधन, उपकरण, बजट, भू-राजनीति और युद्ध क्षमता के आधार पर तैयार की जाती है।
सबसे शक्तिशाली देश (Top 10):
- अमेरिका
- रूस
- चीन
- भारत
- दक्षिण कोरिया
- फ्रांस
- जापान
- यूनाइटेड किंगडम
- तुर्की
- इटली
(रैंकिंग में देशों का क्रम Global Firepower के PowerIndex के अनुसार तय होता है; जहाँ कम स्कोर का अर्थ ज्यादा ताकत है)
रिपोर्ट में भारत को चौथा स्थान दिया गया है, जो इसे वैश्विक मिलिट्री पावर में शीर्ष देशों की तुलना में आगे रखता है। भारत की रैंकिंग उसकी विशाल मानव संसाधन क्षमता, आधुनिक हथियार प्रणालियों, वायु-नौसेना शक्ति और रक्षा बजट के संतुलन का परिणाम है।
पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों में अपनी रैंकिंग में गिरावट दर्ज कर रहा है।
- 2024: नौवें स्थान पर था
- 2025: 12वें स्थान पर आया
- 2026: 14वें स्थान पर पहुंच गया
इस गिरावट का मुख्य कारण उसकी परंपरागत युद्ध क्षमता और सामरिक संसाधनों का तुलनात्मक रूप से सीमित होना बताया गया है।
ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स 145 देशों की सैन्य शक्ति का आकलन कई मापदंडों के आधार पर करता है जैसे —
- सक्रिय सैनिकों की संख्या
- विमान और टैंक की ताकत
- नौसेना के बेड़े
- रक्षा बजट
- रसद और आधारभूत संरचना
- भू-राजनीतिक स्थिति
इन संकेतकों के आधार पर PowerIndex तैयार होता है, जिसमें कम पॉइंट वाला देश अधिक सक्षम माना जाता है।
वैश्विक परिदृश्य
- अमेरिका शीर्ष स्थान पर है, जिसमें इसकी विशाल ताकत और तकनीकी श्रेष्ठता प्रमुख भूमिका निभाती है।
- रूस और चीन क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं, जो अपनी विशाल सेनाओं और रणनीतिक हथियार प्रणालियों की वजह से अग्रणी हैं।
- दक्षिण कोरिया, फ्रांस और जापान ने भी विकसित तकनीक और आधुनिक उपयोगी फोर्स के कारण मजबूत स्थिति बनाई है।
विश्लेषकों के अनुसार, भारत की इस उच्च रैंकिंग ने उसकी क्षेत्रीय और वैश्विक सामरिक स्थिति को मजबूत किया है, वहीं पाकिस्तान की रैंकिंग में गिरावट उसकी क्षमता और संसाधनों में कमी को दर्शाती है। हालांकि यह ध्यान देना जरूरी है कि GFP रैंकिंग न्यूक्लियर हथियारों को सीधे नहीं मापती, बल्कि पारंपरिक सैन्य शक्ति के आधार पर तुलना करती है।

