संजय मिश्रा और नीना गुप्ता स्टारर ‘वध 2’ एक स्लो-बर्न थ्रिलर है, जो जेल की पृष्ठभूमि में अपराध, नैतिकता और परिपक्व प्रेम की गहरी कहानी कहती है। यह फिल्म न तो पूरी तरह कमर्शियल सिनेमा है और न ही शुद्ध आर्ट फिल्म — बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। हालांकि विचार मजबूत हैं, लेकिन फिल्म अपनी धीमी गति और अनुमानित सस्पेंस के कारण पूरी ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाती।
फिल्म की कहानी मंजू सिंह (नीना गुप्ता) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक ऐसे अपराध में 28 साल की सजा काट रही हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं। जेल में रहते हुए उन्होंने अपनी अलग दुनिया बना ली है। वहीं तैनात है शंभूनाथ मिश्रा उर्फ शंभु (संजय मिश्रा) — एक संवेदनशील पुलिसकर्मी, जिसके साथ मंजू का रिश्ता बेहद भावनात्मक लेकिन सीमाओं में बंधा हुआ है।
कहानी में मोड़ तब आता है जब खतरनाक अपराधी केशव उर्फ भूरी भैया (अक्षय डोगरा) जेल में आता है। उसका आतंक जेल के सिस्टम तक में फैल जाता है। एक रात कुछ ऐसा होता है कि अगली सुबह केशव जेल से गायब हो जाता है… और 11 महीने बाद उसकी कंकाल बनी लाश शंभु के घर के पीछे मिलती है।
अब सवाल उठता है —
हत्या किसने की? क्यों की? और सच सामने आएगा या दबा दिया जाएगा?
🎥 निर्देशन कैसा है?
- निर्देशक जसपाल सिंह संधू की मंशा साफ है — वे मनोरंजन से ज्यादा दर्शक को सोचने पर मजबूर करना चाहते हैं।
- फिल्म का पहला हाफ काफी धीमा है और कई जगह खिंचा हुआ लगता है।
- सेकंड हाफ में कहानी रफ्तार पकड़ती है और सस्पेंस खुलता है।
- लेकिन कहानी का बड़ा हिस्सा पहले से अनुमानित हो जाता है, जिससे थ्रिल का असर कम हो जाता है।
- क्लाइमैक्स एक नैतिक संदेश देता है — “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे” — लेकिन अगर खुलासा थोड़ा और चौंकाने वाला होता तो असर ज्यादा गहरा पड़ता।
🌟 अभिनय – फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
🔹 संजय मिश्रा
एक बार फिर कमाल। शांत, दबा हुआ दर्द, भीतर का प्रेम — सब बिना ज्यादा संवादों के बयां कर देते हैं।
🔹 नीना गुप्ता
उनका अभिनय बहुत सादा है, लेकिन भावनात्मक रूप से बेहद असरदार। मंजू का किरदार किसी नारेबाज़ी के बिना मजबूत लगता है।
👉 दोनों के बीच का रिश्ता फिल्म का सबसे खूबसूरत और परिपक्व पहलू है — बिना किसी बनावटी रोमांस के।
🔹 सहायक कलाकार
- कुमुद मिश्रा मजबूत शुरुआत करते हैं, लेकिन किरदार का ग्राफ थोड़ा अस्थिर लगता है।
- अक्षय डोगरा कम स्क्रीन टाइम में भी खौफ पैदा करते हैं।
- बाकी कलाकार अपने किरदारों में ईमानदार हैं।
🎞️ तकनीकी पक्ष
पक्ष असर
सिनेमैटोग्राफी साधारण लेकिन यथार्थपूर्ण जेल माहौल
एडिटिंग थोड़ी ढीली, खासकर सेकंड हाफ में
म्यूजिक यादगार नहीं
बैकग्राउंड स्कोर सस्पेंस बनाए रखने में मददगार
❌ कमियां
- कहानी का सस्पेंस काफी हद तक प्रेडिक्टेबल
- धीमी रफ्तार हर दर्शक को पसंद नहीं आएगी
- कुछ किरदारों की बैकस्टोरी अधूरी लगती है
✅ फिल्म क्यों देखें?
अगर आप
✔ संजय मिश्रा और नीना गुप्ता के अभिनय के फैन हैं
✔ गंभीर और परिपक्व कहानियां पसंद करते हैं
✔ भावनात्मक लेकिन सधी हुई थ्रिलर देखना चाहते हैं
तो यह फिल्म आपको पसंद आ सकती है।
लेकिन अगर आप तेज रफ्तार, ट्विस्ट से भरी या मसालेदार एंटरटेनमेंट चाहते हैं — तो यह फिल्म आपको धीमी लग सकती है।
‘वध 2’ एक सोचने पर मजबूर करने वाली, भावनात्मक थ्रिलर है, जो मजबूत अभिनय के बावजूद अपनी धीमी रफ्तार और अनुमानित सस्पेंस की वजह से पूरी तरह असरदार नहीं बन पाती।

