उत्तराखंड में चुनाव के लिए सजने लगी आप की फील्डिंग

उत्तराखंड  में इन दिनों आम आदमी पार्टी का मानवीय चेहरा खूब चमक रहा है। मीडिया कवरेज भी खूब मिल रही है और आप नेताओ की गतिविधियां भी एकाएक तेज हो गई हैं। जाहिर है अगले साल मार्च में होने वाले चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी पूरी मुस्तैदी से जुट गई है।
कोरोना की पहली लहर के दौरान जो घाव दिल्ली में उत्तराखंडियों को मिले, लगता है इस दूसरी लहर के दौरान उन्हें भरने के लिए आप नेता जी जान से जुटे हैं। याद रखें यह हृदय परिवर्तन चुनावी जरूरत ने किया है।

पहली लहर के दौरान दिल्ली से ढाई लाख उत्तराखंडी प्रवासी बेआबरू होकर आप के कूचे से निकले थे, तब शायद आप आलाकमान को अहसास नही था कि उत्तराखंड में चुनाव भी लड़ना पड़ सकता है। इस कारण चड्डा जैसे नेताओं ने पूरी दिल्ली में डीटीसी बसें लगा कर पहाड़ियों को आनंद विहार बस अड्डे पर धकेल दिया था, उस दौरान जो लोग दिल्ली में रह गए थे उनके अनुभव भी बुरे ही रहे। पहाड़ियों का स्वाभिमान सर्वविदित है कि राहत सामग्री के लिए वे लाइन में नही लगे, दूसरे उम्मीद थी कि दिल्ली के अन्य लोगों खासकर पड़ोस के अल्पसंख्यकों की तरह उन्हें भी उदारता से घर पर राहत पहुंचाई जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दिल्ली के आली गांव का एक उदाहरण देख कर आप मामले को समझ सकते थे। यहां पर छोटी मोटी नौकरी करने वाले पहाड़ी बड़ी संख्या में रहते हैं, साथ में अल्पसंख्यक आबादी भी है। हुआ ये कि अल्पसंख्यकों को कई कई बार राहत सामग्री बांटी गई जबकि पहाड़ी तरसते रह गए थे। अगर उस समय ये भेदभाव नहीं किया गया होता तो आज पहाड़ियों के दिल में आम आदमी पार्टी के प्रति बेहतर भावना होती। उस समय जब जरूरतमंद लोग परेशान लोगों में हायतौबा मची तो तब गढ़वाल हितैषिणी सभा आगे आई, तब जाकर लॉकडाउन के दौर में लोगों के चूल्हे जले। कमोबेश इसी तरह की शिकायतें तिमारपुर, करावलनगर, शाहदरा, विनोद नगर, खिचड़ीपुर, कोंडली, पालम जैसे स्थानों से सामने आई और ढाई लाख लोग अकेले पौड़ी जिले में लौटे थे। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली में 25 लाख से अधिक प्रवासी उत्तराखंडी रह रहे हैं, पिछले चुनाव में इन लोगों ने खुल कर आम आदमी पार्टी का समर्थन किया था, बेशक उसमें एक बड़ा मुद्दा फ्री बिजली पानी भी था, लेकिन उसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ी है, यह किसी से छिपा नहीं है। हालंकि लोगों की याददाश्त कमजोर होती है, लोग जल्दी भूल जाते हैं

 

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