उत्तराखंडियों की आर्थिकी को भी मजबूत बनाएंगे अब बांस के जंगल

बांस के जंगल अब उत्तराखंडियों की आर्थिकी को भी मजबूत बनाएंगे। बांस के उत्पादों की बाजार में मांग को देखते हुए वन विभाग ग्रामीणों को रोजगार देने की योजना बना रहा है। इसके लिए बांस के प्लांटेशन से लेकर उत्पादों के निर्माण को ट्रेनिंग दी जाएगी। जल्द ही असम और अन्य पूर्वी राज्यों का दौरा कर विभाग के अधिकारी बांस उद्योग की बारीकियां सीखेंगे।

उत्तराखंड में बांस के जंगलों को बढ़ावा देने के लिए वन विभाग की ओर से कार्ययोजना तैयार की जा रही है। पर्यावरण के लिहाज से भी लाभकारी बांस अब ग्रामीणों के लिए रोजगार का साधन भी बनेगा। बांस के हस्तनिर्मित उत्पादों को बाजार में उतारकर ग्रामीण आजीविका का साधन बना सकते हैं। वन विभाग की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में बांस के प्लांटेशन के साथ ही समितियों का गठन किया जाएगा। जिसमें वन पंचायतों के तहत आने वाले गांवों को जोड़कर ‘बैंबू प्रोडक्ट’ तैयार करने की ट्रेनिंग दी जाएग, जिसके बाद वे उत्पादों को बाजार में बेच सकेंगे। इस योजना से वनों के साथ ही ग्रामीणों को भी लाभ मिलेगा। यह छोटे और मझोले उद्यमों के क्षेत्र के विस्तार का भी आधार बन सकता है। इसके लिए उत्तराखंड बैंबू एंड फाइबर डेवलपमेंट बोर्ड से भी सहयोग लिया जाएगा।

बांस का पेड़ 4-5 साल में परिपक्व हो जाता है, जबकि ठोस लकड़ी वाले किसी पेड़ को परिपक्व होने में करीब 50 साल लगते हैं। वहीं, बांस की पर्यावरण पर बुरा असर डाले बगैर कटाई की जा सकती है। बांस का पेड़ हर प्रकार की जलवायु में पनप सकता है। हर साल इसके एक पेड़ से 8-10 शाखाएं निकलती हैं। अन्य पेड़ों की तुलना में बांस का पेड़ 35 प्रतिशत अधिक ऑक्सीजन वायुमंडल में छोड़ता है और 20 प्रतिशत कार्बनडाई-ऑक्साइड अवशोषित करता है।

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