विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तराखंड में दलबदल शुरू; जाने पूरी खबर

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तराखंड में दलबदल शुरू हो गया है। पहले एक निर्दलीय विधायक भाजपा में शामिल हुए और अब कांग्रेस के एक विधायक ने भाजपा का दामन थाम लिया। अमूमन चुनाव से पहले निष्ठा बदलने का ऐसा राजनीतिक खेल आम बात है। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद यहां कई बार दलबदल देखने को मिला है।वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्ता में आने पर पौड़ी गढ़वाल से सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनाया गया। विधायक बनने के लिए खंडूड़ी को उप चुनाव लड़ना था। खंडूड़ी के लिए कांग्रेस विधायक टीपीएस रावत ने अपनी सीट छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। फिर रावत, खंडूड़ी की पौड़ी गढ़वाल सीट से सांसद बने।

ठीक यही कहानी वर्ष 2012 में तब दोहराई गई, जब कांग्रेस सत्ता में आई। कांग्रेस ने अपने टिहरी के सांसद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया। उनके लिए सीट छोड़ी किरण मंडल ने, जो सितारगंज से भाजपा के विधायक थे। दलबदल का सबसे बड़ा उदाहरण राज्य की तीसरी विधानसभा रही। उस समय कांग्रेस सत्ता में थी, लेकिन 11 विधायकों ने सत्ता छोड़ भाजपा में जाने का विकल्प चुना। हालांकि इसका कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत से मतभेद रहे, लेकिन जितनी बड़ी संख्या में तब विधायक कांग्रेस से भाजपा में गए, वैसा राज्य के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।

अब जबकि अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव को थोड़ा ही वक्त रह गया है तो पाला बदल का सिलसिला भी शुरू हो गया है। इसके पीछे नेताओं का राजनीतिक नफा-नुकसान का गणित हो सकता है, मगर सवाल निष्ठा पर भी खड़ा होता है। राजनीतिक नजरिये से इसके अलग मायने हो सकते हैं, लेकिन जनता के दृष्टिकोण से भी इस पहलू को देखा जाना आवश्यक है। जिस प्रतिनिधि को जनता ने भरोसा जताकर विधानसभा में भेजा, वह उस कसौटी पर खरा उतरने में सफल रहा अथवा नहीं, यह आकलन तो जनता करेगी ही। यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित प्रतिनिधि की अपने क्षेत्र के प्रति कितनी निष्ठा रही।यदि वह क्षेत्र और जनता के प्रति समर्पित होकर कार्य करे तो उसे पाला बदलने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। सियासी दलों को भी ऐसे प्रतिनिधियों की पहचान करते हुए उन्हें तवज्जो देनी पड़ेगी। इससे चुनाव से पहले पाला बदलने जैसी बातें सामने नहीं आएंगी।

 

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