डॉ सर्वपल्ली ने राधाकृष्णन सोवियत संघ के साथ भारत के रिश्तों की नींव रखी

अभिनव जोशी

5 सितंबर 1888 को भारत के तमिलनाडु शहर में जन्में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के महान शिक्षकों में से एक हैं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जन्मतिथि के दिन 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने सोवियत संघ के साथ भारत के रिश्तों की नींव रखी।

भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के पास उनके कुछ छात्र आये और उनसे उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की मांग की। उनकी मंजूरी के बाद 5 सितंबर 1962 से हर साल भारत में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन राष्ट्र के शिक्षक बने। वह स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। शिक्षा के क्षेत्र में और एक राजनीतिक नेता के रूप में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनके कार्यों और उपलब्धियों ने कई युवाओं को प्रेरित किया है। जब उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की, तो राधाकृष्णन के पिता चाहते थे कि वह आगे की पढ़ाई के बजाय एक मंदिर में पुजारी बने। लेकिन उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से एक छात्रवृत्ति जीतने के लिए कड़ी मेहनत की, जो उन्हें स्नातक की पढ़ाई तक काम आई । उन्होंने 1906 में प्रथम श्रेणी में बीए पास किया।

वह विज्ञान में स्नातकोत्तर करना चाहते थे, लेकिन उनकी दिशा बदल गई। अपने चचेरे भाई से दर्शनशास्त्र विषय की पाठ्यपुस्तकें ली और दर्शनशास्त्र में एमए पूरा किया। उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा मानसिक और नैतिक विज्ञान के प्रोफेसर का पद लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। वे कलकत्ता में रवींद्रनाथ टैगोर से मिले। वह नोबेल पुरस्कार विजेता के दर्शन से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उस पर अपनी पहली पुस्तक लिखने का फैसला किया। उन्होंने मैनचेस्टर कॉलेज और शिकागो में हास्केल में भी व्याख्यान दिया था।

उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्मों के स्पैल्डिंग प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया। वह 1952 में भारत के उपराष्ट्रपति बने और इससे पहले उन्हें 1946 में यूनेस्को और फिर सोवियत संघ में राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया था।

उन्होंने सोवियत संघ (अब रूस) के साथ भारत के संबंधों की नींव रखी। शीत युद्ध के समय 1949-53 में उन्हें मास्को में भारत के दूसरे राजदूत के रूप में भेजा गया था। वहां उन्होंने सोवियत संघ के साथ भारत के संबंधों को सकारात्मक रूप से प्रबंधित किया। बैठक के दौरान स्टालिन ने कहा कि ताली बजाने में दो हाथ लगते हैं और शीत युद्ध के लिए एक और पक्ष भी जिम्मेदार है। फिर, राधाकृष्णन ने उत्तर दिया, “एक शांतिप्रिय देश के रूप में, सोवियत संघ को अपना हाथ वापस लेना चाहिए क्योंकि ताली के लिए दो हाथ लगते हैं”।

1962 में उन्हें भारत के राष्ट्रपति के रूप में चुना गया। जब उन्हें भारत के राष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किया गया तो उनका स्वागत बर्ट्रेंड रसेल ने किया। क्या आप जानते हैं कि जब वे राष्ट्रपति बने, तो उनके कुछ छात्रों ने उनसे उनका जन्मदिन मनाने का अनुरोध किया, तो उन्होंने जवाब दिया “मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय, यह मेरे लिए गर्व की बात होगी कि 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए”? तब से उनके जन्मदिन को हमारे जीवन में शिक्षकों के योगदान को याद करने के दिन के रूप में चिह्नित किया गया है। अमेरिकी शिक्षक पॉल आर्ट्यू शिलिप ने राधाकृष्णन को ‘पूर्व और पश्चिम के बीच एक जीवित सेतु’ कहा क्योंकि उन्होंने बहुत ही शालीनता से पश्चिमी शब्दों में भारतीय विचारों की व्याख्या की थी। उन्होंने दुनिया को साबित कर दिया कि भारतीय विचारों के कारण और तर्क हैं।

उनका नाम लगातार पांच वर्षों तक साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। लेकिन उन्हें कभी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। उन्होंने 1954 में भारत रत्न सहित कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार और खिताब जीते, शिक्षा के लिए उनकी सेवा के लिए 1931 में जॉर्ज पंचम द्वारा नाइट की गई, और 1963 में ब्रिटिश रॉयल ऑर्डर ऑफ मेरिट की मानद सदस्यता। जब वे जून 1931 में जॉर्ज पंचम द्वारा उनके गहन शोध, डेटा और उनकी सेवाओं के कारण उन्हें नाइट की उपाधि से सम्मानित किया गया था। हालाँकि, उन्होंने ‘सर’ की उपाधि का उपयोग करना बंद कर दिया और भारतीय स्वतंत्रता के बाद, डॉ राधाकृष्णन ने अपने अकादमिक शीर्षक ‘डॉक्टर’ का उपयोग करना पसंद किया।

1975 में, उन्होंने “भगवान की एक सार्वभौमिक वास्तविकता जिसने सभी लोगों के लिए प्रेम और ज्ञान को अपनाया” की धारणा को बढ़ावा देने के लिए टेम्पलटन पुरस्कार जीता। क्या आप जानते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी पुरस्कार राशि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को दान कर दी थी? और डॉ. राधाकृष्णन की याद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने “राधाकृष्णन शेवनिंग स्कॉलरशिप” के नाम से एक स्कॉलरशिप की स्थापना की है। उनके बारे में एक और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि भारत के राष्ट्रपति बनने के बाद वे एक विनम्र व्यक्ति बने रहे। उन्होंने अपने वेतन में से केवल 2500 रुपये 10,000 रुपये स्वीकार किए और शेष राशि हर महीने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में दान कर दी।उन्होंने स्वतंत्रता पूर्व युग में घनश्याम दास बिड़ला और कुछ अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर कृष्णर्पण चैरिटी ट्रस्ट का भी गठन किया था। इसलिए, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान शिक्षक, एक व्यक्ति थे, और कठिन समय में सफलतापूर्वक भारत का नेतृत्व किया। जब वे राष्ट्रपति बने, तब भारत चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध लड़ रहा था। उन्होंने कई खिताब और प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते थे। वह यूनेस्को के राजदूत थे और उन्हें भारत रत्न मिला था। इससे पहले, वह आंध्र विश्वविद्यालय और बनारस विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। 16 अप्रैल, 1975 को चेन्नई में उनका निधन हो गया।

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