प्रदेश में वनाग्नि प्रबंधन में बेहतर काम करने वाली वन पंचायतों को वन विभाग करेगा सम्मानित

वन पंचायतों के अपने जंगल हैं और इन जंगलों की देखरेख की सारी जिम्मेदारी भी इनकी है। इसके साथ ही वन उपज का उपयोग भी वन पंचायतें कर पाती है। प्रदेश में 15 फरवरी से फायर सीजन भी शुरू हो रहा है। वन पंचायतों के अधीन प्रदेश के कुल वन क्षेत्र में से करीब 14 प्रतिशत वन क्षेत्र हैं। अधिकतर वन क्षेत्र इनको सिविल सोयम से मिला है। बड़ा वन क्षेत्र वन पंचायतों के अधीन होने के कारण अब वन विभाग ने वनाग्नि को रोकने में वन पंचायतों का सहयोग लेने का फैसला किया है।

वन मंत्री हरक सिंह के मुताबिक कई वन पंचायतों ने वन प्रबंधन में आदर्श प्रस्तुत किया है। आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए वनाग्नि प्रबंध में बेहतर काम करने वाली वन पंचायतों को सम्मानित करने का भी फैसला किया गया है। पहले स्थान पर रहने वाली वन पंचायत को पांच लाख और दूसरे स्थान पर रहने वाली वन पंचायत को तीन लाख रुपये दिए जाएंगे। वन विभाग के अधिकारियों को इस योजना का खाका बनाने को कह दिया गया है।

इस बार सर्दियों में भी जंगल के आग के कई मामले सामने आए हैं। बेमौसम की इस आग से वन महकमा खासे दबाव में भी है। शुक्रवार को वन विभाग के अधिकारियों के साथ मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत वनाग्नि रोकने की योजना की समीक्षा भी कर रहे हैं।जंगल पर अधिकार के संघर्ष के कारण उपजी वन पंचायतों को लेकर ब्रिटिश राज में 1931 में वन पंचायत कानून बनाया गया था। राज्य गठन के बाद 2001 में वन पंचायत कानून बनाया गया और 2012 में इसमें संशोधन किया गया। प्रदेश में करीब 15 हजार वन पंचायतों के अधीन 5.23 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र है।

 

 

 

 

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