अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे उत्तराखंड के गांवों से पलायन रोक कि योजना तैयार

अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे उत्तराखंड के गांवों से पलायन न हो, इसके मद्देनजर बजट में पलायन की रोकथाम और सीमांत क्षेत्रों के विकास पर खास फोकस किया गया है। इस कड़ी में पांच सीमांत जिलों के नौ विकासखंडों में आजीविका विकास और रिवर्स पलायन को प्रोत्साहित करने को बजट में मुख्यमंत्री सीमांत क्षेत्र विकास योजना में 20 करोड़ का प्रविधान किया गया है, जबकि बेरोजगारों और गांव लौटे प्रवासियों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना में कौशल विकास के लिए 18 करोड़ के प्रविधान से नई उम्मीद जगी है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि उत्तराखंड के गांव पलायन का दंश झेल रहे हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट बताती है कि राज्य गठन के बाद से अब तक 1702 गांव पलायन के कारण निर्जन हो चुके हैं। इसके अलावा सैकड़ों गांवों में आबादी अंगुलियों में गिनने लायक रह गई है। यही नहीं सीमांत जिलों के गांवों से भी पलायन का सिलसिला कम होने का नाम नहीं ले रहा। सूरतेहाल चिंता बढऩा लाजिमी है। हालांकि, कोरोना संकट के चलते बदली परिस्थितियों में बड़ी संख्या में प्रवासी देश के विभिन्न हिस्सों से वापस गांव लौटे हैं। इनमें से करीब दो लाख अभी गांवों में ही रुके हैं। अब वे फिर से पलायन न करें और अन्य लोग भी पलायन से बचें, इस पर खास ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

गुरुवार को विधानसभा में पेश किए गए राज्य के बजट में यह चिंता जाहिर भी की गई है। सीमांत क्षेत्रों के गांवों में आजीविका व स्वरोजगार के अवसर मुहैया कराने से पलायन पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। इसी के दृष्टिगत बजट में प्रविधान भी किया गया है। इसके अलावा राज्य से पलायन न हो, इसके लिए गांव लौटे प्रवासियों के साथ ही यहां के युवाओं को उनके हुनर के मुताबिक कौशल विकास में वृद्धि की जानी चाहिए।  इसके लिए कौशल विकास की योजनाओं को गंभीरता से धरातल पर उतारना होगा और बजट में इसका उल्लेख करने के साथ ही बजट प्रविधान किया गया है। यही नहीं, गांवों में मूलभूत सुविधाओं के विकास पर भी ध्यान केंद्गित करने का इरादा सरकार ने जाहिर किया है।

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