पंजाब में पार्टी के भीतर चल रहे घमासान के ताजे एपीसोड को लेकर कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत खासे असहज हैं

पंजाब में पार्टी के भीतर चल रहे घमासान के ताजे एपीसोड को लेकर कांग्रेस महासचिव और प्रदेश प्रभारी हरीश रावत खासे असहज हैं।  पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने जिस तरह आनन-फानन अपने इस्तीफे का एलान किया, वह पार्टी नेतृत्व को कतई रास नहीं आया। यही वजह है कि कई दिन गुजर जाने के बावजूद सिद्धू के इस्तीफे को लेकर आलाकमान ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। पंजाब कांग्रेस के अंदरूनी गतिरोध के समाधान में केंद्रीय भूमिका निभाते आ रहे हरीश रावत खुद भी इससे बाहर निकल अपना पूरा वक्त अब उत्तराखंड को देना चाहते हैं।लगभग ढाई महीने पहले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की असहमति के बावजूद कांग्रेस ने नवजोत सिंह सिद्धू पर भरोसा कर उन्हें पार्टी संगठन का मुखिया बना दिया। इस पूरे घटनाक्रम में हरीश रावत की ही सबसे बड़ी भूमिका रही। उन्होंने आलाकमान के संकेतों को बखूबी समझा और उसी के मुताबिक पंजाब में कदम आगे बढ़ाए। संभवतया पार्टी की सोच कैप्टन के खिलाफ संभावित एंटी इनकंबेंसी को चुनाव से पहले कम करने की रही। तब कांग्रेस को पूरी उम्मीद थी कि सिद्धू धीरे-धीरे कैप्टन से पटरी बिठा लेंगे और चुनाव में जाने से पहले सब कुछ ठीक हो जाएगा।

कांग्रेस ने अपनी चुनावी संभावनाएं पुख्ता करने के लिए कैप्टन अमरिंदर जैसे दिग्गज को दरकिनार कर सरकार में नेतृत्व परिवर्तन जैसा अहम कदम तक उठा लिया। नेता विधायक दल के तौर पर भी सिद्धू के ही नजदीकी चरणजीत सिंह चन्नी को चुना गया। यहां तक तो सब सामान्य नजर आ रहा था, मगर इसके बाद प्रदेश प्रभारी हरीश रावत ने चन्नी को अनुसूचित जाति के चेहरे के रूप में स्थापित करता हुआ एक बयान दिया, जिससे सिद्धू को झटका लगा। इससे विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के सत्ता में आने की स्थिति में उनके खुद के मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा धूमिल पड़ती दिखी। इसीलिए शायद सिद्धू ने बगैर आलाकमान से बात किए इंटरनेट मीडिया के जरिये प्रदेश अध्यक्ष पद से अपने इस्तीफे का एलान कर डाला। हरीश रावत, जिनकी सिद्धू को पंजाब कांग्रेस की कमान सौंपने में सबसे अहम भूमिका रही थी, उन्हें भी सिद्धू ने विश्वास में नहीं लिया। इस बात की पुष्टि स्वयं रावत ने की। ‘जागरण’ से बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें इस्तीफे के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी। इससे रावत ने खुद को आहत महसूस किया। सिद्धू का यह अप्रत्याशित कदम कांग्रेस आलाकमान को भी नागवार गुजरा। इसके बाद ही रावत का पंजाब दौरा स्थगित कर दिया गया और वह उत्तराखंड लौट आए।

पंजाब कांग्रेस की नवीनतम स्थिति और सिद्धू के इस्तीफे पर जब ‘जागरण’ ने हरीश रावत से बात की तो उन्होंने बस इतना ही कहा कि पार्टी के एक वरिष्ठ नेता को पंजाब भेजा गया है। मुख्यमंत्री चन्नी के माध्यम से बातचीत कर विवाद का समाधान करने की कोशिश की जा रही है। चन्नी और सिद्धू के बीच बातचीत हुई है। इससे काफी कुछ साफ हो गया कि कांग्रेस आलाकमान ने अब पूरा दारोमदार मुख्यमंत्री चन्नी पर छोड़ दिया है और सिद्धू से जो भी बातचीत होगी, उसमें हाईकमान प्रत्यक्ष तौर पर शामिल नहीं रहेगा।रावत खुद भी कुछ दिनों पहले यह कह चुके हैं कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वह पंजाब का प्रभार छोड़ना चाहते हैं और जल्द आलाकमान से इस संबंध में बात करेंगे। दरअसल, हरीश रावत उत्तराखंड में कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हैं। उत्तराखंड में चुनाव को महज तीन-चार महीने का ही वक्त शेष है। ऐसे में ज्यादा संभावना इसी बात की है कि पंजाब कांग्रेस को जल्द नया प्रभारी मिल जाएगा और रावत की पूरी सक्रियता उत्तराखंड की राजनीति में नजर आएगी।

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