पीएम के साथ मंच साझा करने वाले नामों को लेकर नौकरशाह व सत्ताधारी दल के प्रतिनिधियों में एक नई चिंगारी सुलग गयी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा राजा महेंद्र प्रताप राज्य विश्वविद्यालय के शिलान्यास समारोह का कार्यक्रम भले ही सकुशल निपट गया हो, लेकिन अंदरखाने नौकरशाह व सत्ताधारी दल के प्रतिनिधियों में एक नई चिंगारी सुलग गयी है। यह चिंगारी है पीएम के साथ मंच साझा करने वाले नामों को लेकर। भले ही मंच के नामों पर अंतिम मुहर पीएमओ से लगी हो, लेकिन कई बड़े लोगों के नाम हाकिमों ने पीएमओ को भेजे ही नहीं। इसमें माननीयों के साथ ही केंद्र व राज्य के मंत्रियों तक के नाम शामिल हैं। लोगों को भी समाज के अपने इन चहेते नेताओं का पीएम के साथ मंच पर न दिखना काफी अखरा। सूत्रों के अनुसार पार्टी भी इस मामले को गंभीरता से ले रही है और सूची तैयार करने वालों जवाब तलब की तैयारी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह प्रकरण कितना आगे जाता है, हालांकि अफसरों की इसमें जरूर जान फंसती दिख रही है।

समय बलवान होता है। इसका पहिया जब घूमता है तो राजा काे रंक और रंक को राजा बना देता है। राजनीति और नौकरशाही में तो एक क्षण मात्र में ही सब कुछ बदल जाता है। जिले की एक तहसील के हाकिम व माननीयों का भी समय से जुड़ा एक ऐसा ही दिलचस्प किस्सा है। एक समय था, जब हाकिम का बोलबाला था। कोई भी काम थोड़ा भी नियमों से इधर-उधर होता तो वह बड़ी-बड़ी सिफारिशों को भी दरकिनार कर देते थे। पंचायत चुनाव के मतदाता सूची पुनरीक्षण में भी हाकिम की माननीयों की खूब तकरार हुई थी, लेकिन वह कहीं झुके नहीं। बड़े साहब के सामने भी माननीयों ने हाकिम की कई बार शिकायतें कीं, लेकिन यहां भी कभी दाल नहीं गली। अब कुछ दिन पहले माननीय के भाग्य से ऐसा छींका टूटा कि बड़े साहब का जिले से तबादला हो गया। अब माननीय की जिद पर नए साहब ने हाकिम को तहसील से पैदल कर दिया है।

योगी सरकार भले सरकारी विभागों में जीरो टालरेंस के लाख दावे करे, लेकिन हकीकत कभी छिपाई नहीं जा सकती। जिले में पब्लिक से जुड़ा शायद ही कोई विभाग हो, जहां वसूली का खेल न चलता हो। कुबेर के घर में भी बेईमान खूब घुसपैंठ कर रहे हैं। यहां के कर्मी बिना सुविधा शुल्क लिए कोई काम नहीं करते हैं। इलाज का भुगतान हो या फिर पेंशन संबंधी कार्य। बिना कमीशन दिए किसी की फाइल आगे नहीं बढ़ती। पुलिस से लेकर प्रशासनिक कर्मियों तक तो यहां सुविधा शुल्क देना पड़ता है। बड़े अफसरों की डांट का भी इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। कई बार तो विभाग के मुखिया ने ही खूब हड़काया है, लेकिन फिर भी इन बेईमानों के कानों पर जूं तक रेंगी। पटल बदलने का भी कोई डर नहीं हैं। अब तो लोगों को बड़े साहब से ही उम्मीद है कि वह कोई ऐसा एक्शन लें कि घूंस के नाम पर ही इनके हाथ कांपने लगें।

प्रदेश सरकार ने पिछले सालों में बेहतर काम करने वाली जिले के बिजौली ब्लाक की तीन पंचायतों को परफार्मेंस ग्रांट के तहत 40 करोड़ के अतिरिक्त बजट की सौगात दी है। पंचायत चुनाव से पहले ही यह धनराशि पंचायतों के खातों में आ गई थी। अब इन पंचायातों के प्रधान व सचिवों ने इससे निर्माण कार्य शुरू करा दिए हैं। पहले चरण में करीब दो करोड़ की धनराशि से 30 से अधिक कार्यों के टेंडर हुए हैं। अधिकांश टेंडरों पर काम भी शुरू हो गया है, लेकिन इन कामों में जमकर नियमों को दरकिनार किया जा रहा है। प्रधान व सचिव चहेते ठेकेदारों को काम दे रहे हैं। अगर अब तक जारी टेंडरों की पड़ताल की जाए तो अधिकांश ठेकेदार प्रधान व सचिवों के स्वजन, रिश्तेदार व अन्य चहेते लोग ही हैं। इससे कामों की गुणवत्ता भी प्रभावित होनी तय हैं। वहीं, सब कुुछ जानकारी में होने के बाद भी जिम्मेदार आंखे मूंदे बैठे हैं।

 

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